Tuesday, December 28, 2010

उलझा हूँ बरसों से इसी पहेली में !



बसा लिया है तुमको दिल की हवेली में,
चूमता हूँ नाम तेरा लिख के हथेली में।

किस हद तक आँऊ पास तुम्हारे,
उलझा हूँ बरसों से इसी पहेली में।

मन आज उदास तू भी नहीं है पास,
ढूँढ रहा हूँ वो शोख अदा तेरी सहेली में।

सैकडो़ फूल हैं उपवन में एक से एक,
माली का मन क्यों रमा चमेली में।


महेश मूलचंदानी


Monday, December 27, 2010

सारी बस्ती को मेरी दावत होगी !


ये तो सोचा भी न था उनसे मोहब्ब़त होगी,
एक नास्तिक से ईश्वर की इबादत होगी !

किस्से कई सुने हैं प्यार मोहब्बत वफ़ा के,
किसे पता था इश्क में मेरी भी शहादत होगी !

ये दिल क्या मेरा दिल है दिल नहीं मानता,
मेरे दिल की मुझसे ही बगावत होगी !

एक निगाह डालेगा वो जिस रोज प्यार की,
सारी बस्ती को मेरी दावत होगी !


महेश मूलचंदानी

Sunday, December 26, 2010


मुहिंजूँ सिंधी कविताऊँ


दिल जो एहसास


मूखे
तोसाँ इश्क थियो आहे
माँण्हू चवन था
शहर में हिकु
चरियो बियो वधी वयो आहे !





घड़ी घड़ी मुहिंजे
उथे थो इहो सवालु
दर दरियूं सभु बंद आहिन
किथाँ अचे थो तुहिंजो ख्यालु !

प्यार न सही
तूँ मूसाँ नफरत कर
का त तूँ मुहिंजी
पूरी हसरत कर !


डिसी तुहिंजो रुप सिंगारु
सोचा थो
माँ किथे रस्तो त न भुली वयो आहियाँ
सुर्ग हिते अची वयो आहे
या माँ सुर्ग में पहुँची वयो आहियाँ !

गर न हुजे हाँ
तो में ऐडो गुरुर
शायद, माँ बि न हुजाँ हाँ
तुहिंजे इश्क में चूर !

भले तुहिंजो बदन थी वंञे पत्थर
को गम नाहें
पर, उन्हीय में दिल दिल वांगुर ही हुजे
जे को एहसास करे प्यार जो
कडहिं कडिंह ख्यालु रखे यार जो !

तूँ रोज ही सुख साँ सुमंधी आहें
फिटाए मुहिंजी निंड्र
खबर न हुई रात हि
इहा गाल्हि कई आहे मूँसा चंड्र !







कहिं खे शिकायत कयाँ मां .जमाने में
तुहिंजे इश्क पुजायो आहे पागलखाने में
तहिं खाँ पोय बि सुकून नाहें तोखे
मुहिंजे खिला.फ रिपोट लिखाई अथी थाणें में
डोह ही डोह डिठा अथई तो मुहिंजा
छा, हिक बि खूबी नाहें तुहिंजे दीवाने में
मूँ तोखे खुदा बणाँए छडियो आहे
तो जिक्र तक न कयो पहिंजे अफसाने में
"महेश" खे अलाए छो यकीं न थो थे
तो जहिणो हुस्न बि आहे कुदरत जे ख.जाने में




Thursday, December 23, 2010

रिश्तेदारी

पुलिस ट्रेफिकमेन ट्रैक्टर ड्राइवर पर खीजते हुऍ बोला॰॰॰॰साले तुमसे कितनी बार कहा है कि ट्राली मे सवारियां मत बिठाया करो।
आज तुम्हारा चालान बनाना ही पड़ेगा यूँ सीधी उंगली से घी नही निकलेगा।
नही साहब, ये सवारियाँ नहीं सब रिश्तेदार हैं।
अच्छा अच्छा आज छोड़ रहा हूँ । आइंदा इतने सारे रिश्तेदार एक साथ मत बिठाना समझे।ड्राइवर ने आगे जाकर ट्रेक्टर रोक दिया और बोला .....लाओ काका दस रुपये।
बुआ,मामा,मौसी सभी फटाफट दस दस रुपये निकालो, वो कम्बख्त फिर न आ जाए !



राहत

कल्लू आजकल हद से ज्यादा शराब पीने लगा है। उसकी हालत भी दिन-ब- दिन गिरती जा रही है।यह भी सुना है उसे कैंसर हो गया है। पैसे बर्बाद कर रहा है सो अलग । तुम बीवी होकर उसे समझाती क्यों नहीं ?

भैया, मैं तो समझा समझा कर थक चुकी हूं। कुछ कहती हूं तो मार मारकर अधमरा कर देते हैं। अच्छा ही है उनका शराब पीना, नशे में उन्हें आराम की नींद तो आ जाती है।


जलजला

साहब.....साहब.....
क्या है बे,हीरालाल बोल !
थानेदार साहब इत्मिनान से रोजनामचा उलट रहे थे।
साहब,साहब बहुत बुरी खबर है शहर में जहरीली शराब पीने से दस आदमी मर गए ! हीरालाल के पसीने छूट रहे थे और घबराहट के कारण वह थर थर काँप रहा था।
अरे इसमें घबराने की क्या बात है, हीरालाल ! कोई पहाड़ तो नहीं टूटा,कोई जलजला तो नहीं आ गया ये तो होता ही रहता है तेरे या मेरे घर का तो नहीं मरा.....न ?
दस में ....आपका अनूप भी......
क्या.....?
सुनते ही साहब मूर्छित होकर गिर पड़े।


मौत

पापा,पापा तुम तो कहते थे मौत एक दिन सबको आती है।
पिछले साल दीपू के डैडी मर गये। कल मोंटी के पापा की
एक्सीडेंट में मौत हो गई !
हाँ बेटा, मौत एक न एक दिन सबको आती है।
अच्छा पापा ये मौत कब मरेगी.......?


भूख

माँ.....माँ रोटी दो ना...बडी जोर की भूख लगी है
छह साल की गुड्डी दुबले पतले शरीर से चड्डी लटकाए
माँ से लिपटकर भूख से बिलखती हुई बार बार रोटी मांग रही थी। माँ ने उसे झटककर दूर कर दिया और चीखकर बोली....
परसों सुबह ही तो खाई थी तूने रोटी....अब कहां से ला दूं..? मुझे खाले भट्टी.....तुझे शर्म नहीं आती....है। भगवान..... मां सिर पीट पीटकर रोने लगीँ।
गुड्डी चिल्ला रही थी....
कल से रोटी नहीं खाई.......माँ..आज भी रोटी नहीं मिली ना...तो जैसे अन्नू भैया भूख से मर गए ना वैसे ही देखना एक दिन मैं भी भूख से तड़फ. के मर जाऊँगी !


हैसियत

क्यों बे रामू तेरा बाप कहां है? सालभर हो गया हरामी को.....न कर्ज पटाया न ब्याज भेजा .....मैं कल ही तीरथ से लौटा तो मुनीम जी ने बताया के तेरे बाप ने छदाम् तक नहीं दी.....कहाँ है बुला तो सही उसको...तीरथ से लौटकर उसका मुँह देखना पड़ रहा है.....छिः छिः राम राम कैसे पापी लोग पड़े हैं जगत में
बुला उसे...फिर नहा धोकर पूजा करुँगा ....।
रामू सेठ के पांव पकड़ कर रोने लगा। मेरे बापू को डेढ़ महीने हुए स्वर्गवासी हो गए.......मुझ पर रहम करो सेठ साहब !
तो तेरा बाप स्वर्गवासी हो गया...हाँ ? मेरा कर्ज पटाए बगैर स्वर्ग मिल गया उसे ? तुम हरिजन....नीच लोग......अपनी औकात समझा करो। अरे स्वर्ग तो हम लोगों की जगह है रे छोकरे....दुनियाँ भर के तीरथ करके स्वर्ग मिलता है....पैसे डुबा कर स्वर्ग नहीं मिलता।
तेरा बाप गया परलोक जाने दे....मैं तो तेरे को जानता हूँ..अब एक महीने की मोहलत दे रहा हूँ......पूरी सिलक जमा करवा दे.....नहीं तो नरक क्या होता है यहीं बतला दूंगा, समझे !"



Thursday, December 9, 2010

लघुकथाएँ



पालनकर्ता

सपेरा कफी देर से बीन की धुन पर साँप को नचा रहा था और दर्शकों का मनोरंजन कर रहा था। अब भीड़ में से एक दो और पाँच रुपये के सिक्के साँप के सामने खनकने लगे। जोर जोर से डमरू बजाते हुए " अब नाग देवता का चमत्कार खतम होता है साहिबान , कद्रदान कहकर ,अभिवादन करते हुए वह साँप को पिटारे में बन्द कर सिक्के बटोरने लगा।
भीड़ जा चुकी थी मैं सहज ही सपेरे से पूछ बैठा .." आज तो काफी कमाई कर ली होगी" ! बाबू जी पचास साठ रुपये तो आ ही जाते हैं,उसमें से ये अपना पालक साँप भाई बीस पच्चीस रुपये का दूध पी जाता है....बाकी तीस पेंतीस रुपये अपने पेट के लिये निकल आते हैं..सपेरा बोला,...
क्या सांप से ज्यादा तुम्हारा खर्चा?
हाँ बाबू जी ,शायद आपको मालूम नहीं जीव जन्तुओं से बड़ा पेट आदमियों का होता है ....ये साँप न होता तो मैं न जाने क्या होता....चोर,डाकू,जेबकतरा. या गुण्डा,,, आदमी तो मुझे इसी ने बनाया है!