Thursday, February 17, 2011

शायद हिते... नाँहिन सिंधी ?

शायद हिते... नाँहिन सिंधी ?

गंजन खे कंगी टिकाइन सिंधी
बरपट में बा॒गु लगा॒इन सिंधी
भ़ीख घुरन्दे कड॒हिं न डि॒न्दव
पहिंजी मेहनतअ
ऐं दिमाग जी खाइन सिंधी
पकाईय खाँ कोह परे, दिल जा खुल्यल
सुठन कमन ते धनु लुटाइन सिंधी
आया हुआ त छा हुया
हाणें जिथे किथे
छाइन्जी वया आहिन सिंधी
धंधे में,रांदिन में,राजनीतिय में ऐं
फिल्मुन में था नालो कमाइन सिंधी
शहर शहर,गो॒ठ गोठ॒ में
बज़ारिन जी सुँह वधाइन सिंधी
बु॒सो बु॒सो छो थो लगे हे शहरू
शायद हिते नाँहिन सिंधी
अजु॒ हिते सिंधु छो थी लगे॒
छो त मेला
सिंधीयत जा था मलाइन सिंधी

महेश मूलचंदाणी

Tuesday, February 15, 2011

माई बा॒रअ ज॒णँण वारी...!

माई बा॒रअ ज॒णँण वारी...!

मूं घरवारी खे ताव में अची चयो....
को बि कमु कोन थी करें
तोखे त खपे बासँण मलँण वारी माई
बु॒हारी पाए पोचा लगा॒एँण वारी माई
कपड़ा धोई प्रेस करणँ वारी माई
रोटी पचाएँण वारी माई
बा॒रन खे खेडा॒एँण वारी माई
बाकी तूँ कहड़ो कमु कन्दीय माई
घरवारी वेझो आई
सकुचाई, शर्माई ऐं चययिं...
जेको कमु मां थी कयाँव
बि॒ का बि न करे सघन्दव नारी
छा तव्हाँ खे न खपे
हिकअ माई तव्हाँ जा बा॒रअ ज॒णँण वारी !

महेश मूलचंदाणी

Monday, February 14, 2011

गहरो ग़मु


गहरो ग़मु

शादीय खाँ पोय
पहिरीं डि॒यारी ते
तूँ केडो॒ सुहिंणों लगन्दो हुएं जणुँ अनार
ऐँ तुहिंजी ज़ाल लगन्दी हुई
खुशीय जी रौशनी डे॒वँणवारी फुलझड़ी
हाणें बी॒ डि॒यारी ते
तुहिंजा सुठा कोन था लगि॒न हालअ
पाँण थी वयो आहें चकरी
ऐं जोणें थी वई आहे बमु
हुन रोई करे चयो
अदल, शादी छड़ो डि॒सण में खुशी आहे
पर आहे असल में गहरो गमु !

महेश मूलचंदाणी





Saturday, February 12, 2011

मुनणुँ

मुनणुँ

माउ मुहिंजी, मूखे चयो॓......
पुट्र..... भाँणेजो लहन्दो मुनणुँ
सो वठी अचु वंञी बजा़र मां
भाँणेजे लाए ब॒ ड्रेसूँ
भेडे़ लाए बनारसी साडी़
भेडि़ए लाए हुकु वगो॒
पंज किलो चावरअ, अटैची ऐं सोनअ जो हिकु सगो॒
मूं चयो माउ खे.....
अम्मडि़, अंञा भुली वई आहें
रान्दीका बा॒र जे लाए चवणु
इहो बि बु॒धाए छडि॒
हे, भाँडे़ जे जो लहे थो
या लाराहे थी मुहिंजो मुनणु !

महेश मूलचंदाणी

Thursday, February 10, 2011

सोच आदमी का बौना बहुत है....

सोच आदमी का बौना बहुत है.......

इस दौर का जीवन घिनौना बहुत है,
गंगा में बार बार धोना बहुत है।
यूं तो नापता है, आकाश आदमी,
पर सोच आदमी का बौना बहुत है।
जब से बसे हैं शुभचिंतक पड़ोस में,
दरवाज़ों पर टोटका टोना बहुत है।
खा़नाबदोश मन है भटकता शहर में,
वैभव की बस्तियों में रोना बहुत है।
बिख़रा हुआ है हर मनका अलग अलग,
आज एक सूत में पिरोना बहुत है।
अपनी अर्थी से कांधा न तोड़िए,
जिम्मेदारियाँ इन पर ढ़ोना बहुत है।
एक जुमला और गीता में जोड़ लें,
आपको पाने के लिए खोना बहुत है।

महेश मूलचंदानी

उद्घघाटन का फ़ीता है आदमी . . .

उद्घघाटन का फ़ीता है आदमी . . .

आज इस तरह जीता है आदमी,
गुज़रे कल सा बीता है आदमी।
अपने आँसू गिलास में भरकर,
पानी जैसा पीता है आदमी।
हिरनों जैसी लगती हैं रोटीयाँ,
तेज दौड़ता चीता है आदमी।
परिस्थितियाँ जिसे काट जाती हैँ,
उद्घघाटन का फ़ीता है आदमी।
विवशता के धागों से ज़िंदगी के,
टुकड़े टुकड़े सीता है आदमी।

महेश मूलचंदानी

माँ ने बाँधा था, सर पे तुम्हारे कफ़न !

माँ ने बाँधा था, सर पे तुम्हारे कफ़न !

आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन.
जाँ पे खेला बचाया है तुमने वतन.
जु़ल्म सहते रहे गोली खाते रहे.
बीच लाशों के तुम मुस्कराते रहे.
कतरे कतरे से तुमने सजाया चमन.
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन.
सांप बनकर जो आए थे डसने हमें.
कुचला पैरों से तुमने, मिटाया उन्हें.
कर दिया पल में दुश्मन का तुमने दमन.
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन.
सर झुकाया नहीं, सर कटाते.
देख बलिदान दुश्मन भी जाते रहे.
माँ ने बाँधा था सर पे तुम्हारे कफ़न.
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन.

महेश मूलचंदानी

Wednesday, February 9, 2011

प्यार जो .खुदा बणाँइणु चाहियाँ थो....

प्यार जो .खुदा बणाँइणु चाहियाँ थो.....

तुहिंजे पत्थर दिल खे पिघराइणु चाहियाँ थो,
तहिंमे प्यार जी जोति जगा॒इणु चाहियाँ थो़।
डि॒सी बदलाव तोमें वहिड़ा थी वञिन माँण्हू,
तोखे एहड़ो प्यार जो खुदा बणाँइणु चाहियाँ थो।


महेश मूलचंदाणी