अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी
अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी
ना बुझेगी प्यास चाहे उम्र बीते सारी
अंग अंग छलक रही अम्रत की धारा
किसकी किस्मत में यह कामनी किनारा
मन कहता देखता रहूँ नदी ये कुआँरी
अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी
व्याकुल है कोई स्नान के लिए
और कोई अधरों के पान के लिए
छाई है हर मन में अजब बेकरारी
अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी
मैंने तो चीरकर दिल तुझे दिया
बदले में तू ने मुझे कुछ भी ना दिया
ज़िंदगी ये सारी है मैंने तुझे पे वारी
अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी
महेश मूलचंदानी
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