Monday, March 7, 2011

अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी ....

अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी

अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी
ना बुझेगी प्यास चाहे उम्र बीते सारी

अंग अंग छलक रही अम्रत की धारा
किसकी किस्मत में यह कामनी किनारा
मन कहता देखता रहूँ नदी ये कुआँरी
अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी

व्याकुल है कोई स्नान के लिए
और कोई अधरों के पान के लिए
छाई है हर मन में अजब बेकरारी
अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी

मैंने तो चीरकर दिल तुझे दिया
बदले में तू ने मुझे कुछ भी ना दिया
ज़िंदगी ये सारी है मैंने तुझे पे वारी
अम्रत की नदिया है देह ये तुम्हारी

महेश मूलचंदानी

Sunday, March 6, 2011

घर घर उजाला हो....

घर घर उजाला हो....

चाँद पर चाहे पानी भी खोज निकाला हो,
चाहे क्रिकेट में कंगारूओँ को धो डाला हो।
मुल्क के मालिकों से बस इतनी है, गुजारिश,
हर मुँह में निवाला और घर घर उजाला हो।

महेश मूलचंदानी

Saturday, March 5, 2011

मुस्कराने की मोहक अदा हो

मुस्कराने की मोहक अदा हो

सफलता संघर्षमय सुखद सदा हो,
चाहे दुःख दर्दों का बोझ लदा हो।
हर पल खुशियाँ हासिल होगीं,
बस मुस्कराने की मोहक अदा हो।

महेश मूलचंदानी

Thursday, February 17, 2011

शायद हिते... नाँहिन सिंधी ?

शायद हिते... नाँहिन सिंधी ?

गंजन खे कंगी टिकाइन सिंधी
बरपट में बा॒गु लगा॒इन सिंधी
भ़ीख घुरन्दे कड॒हिं न डि॒न्दव
पहिंजी मेहनतअ
ऐं दिमाग जी खाइन सिंधी
पकाईय खाँ कोह परे, दिल जा खुल्यल
सुठन कमन ते धनु लुटाइन सिंधी
आया हुआ त छा हुया
हाणें जिथे किथे
छाइन्जी वया आहिन सिंधी
धंधे में,रांदिन में,राजनीतिय में ऐं
फिल्मुन में था नालो कमाइन सिंधी
शहर शहर,गो॒ठ गोठ॒ में
बज़ारिन जी सुँह वधाइन सिंधी
बु॒सो बु॒सो छो थो लगे हे शहरू
शायद हिते नाँहिन सिंधी
अजु॒ हिते सिंधु छो थी लगे॒
छो त मेला
सिंधीयत जा था मलाइन सिंधी

महेश मूलचंदाणी

Tuesday, February 15, 2011

माई बा॒रअ ज॒णँण वारी...!

माई बा॒रअ ज॒णँण वारी...!

मूं घरवारी खे ताव में अची चयो....
को बि कमु कोन थी करें
तोखे त खपे बासँण मलँण वारी माई
बु॒हारी पाए पोचा लगा॒एँण वारी माई
कपड़ा धोई प्रेस करणँ वारी माई
रोटी पचाएँण वारी माई
बा॒रन खे खेडा॒एँण वारी माई
बाकी तूँ कहड़ो कमु कन्दीय माई
घरवारी वेझो आई
सकुचाई, शर्माई ऐं चययिं...
जेको कमु मां थी कयाँव
बि॒ का बि न करे सघन्दव नारी
छा तव्हाँ खे न खपे
हिकअ माई तव्हाँ जा बा॒रअ ज॒णँण वारी !

महेश मूलचंदाणी

Monday, February 14, 2011

गहरो ग़मु


गहरो ग़मु

शादीय खाँ पोय
पहिरीं डि॒यारी ते
तूँ केडो॒ सुहिंणों लगन्दो हुएं जणुँ अनार
ऐँ तुहिंजी ज़ाल लगन्दी हुई
खुशीय जी रौशनी डे॒वँणवारी फुलझड़ी
हाणें बी॒ डि॒यारी ते
तुहिंजा सुठा कोन था लगि॒न हालअ
पाँण थी वयो आहें चकरी
ऐं जोणें थी वई आहे बमु
हुन रोई करे चयो
अदल, शादी छड़ो डि॒सण में खुशी आहे
पर आहे असल में गहरो गमु !

महेश मूलचंदाणी